चलो, सवाल उठाते है


चलो, सवाल उठाते है

_Aditya Mishra Blogger
 

नेहरू से लेकर सावरकर और नाथूराम गोडसे वाले सवाल अक्सर आपको मीडिया चैनलों पर उठते हुए दिखाई दे जाएंगे| एक सवाल वीडियो एंकर भी उठाता है, कार्यक्रम खत्म होते-होते दर्शक उठ जाते हैं पर सवाल उठ नहीं पाता।
 | चलो, सवाल उठाते है|

अक्सर उठते उठते उठ जाते हैं सवाल

कुछ सवाल पूछे जाते हैं और कुछ सवाल उठाए जाते हैं, जिन्हें पूछना पड़ता है, उसके पीछे एक बेचैनी और जानकारी का अभाव होता है। वहीं जिन सवालों को उठाना पड़ता है, वास्तव में वे सवाल ही आलसी होते हैं। अक्सर ऐसे सवालों का जवाब हमारे पास होता है, पर हम चाहते हैं कि कोई सवाल तो उठाए|
सामान्य लोग सवाल जवाब करते हैं, पर विशिष्ट लोग सवालों को जनसमर्थन से उठवाते हैं। हालांकि कई बार उठाते उठाते सवाल चकनाचूर भी हो जाते हैं, पर उठाना पहली प्राथमिकता होती है।

राजनीति में अक्सर सवाल उठाने का कार्यक्रम होता है। मीडिया नेताओं पर, नेता एक दूसरे पर और राजनीति स्वयं पर. जनता यहाँ इन सवालों को उठाने का बल प्रदान करती है। सवाल उठाने के लिए जितने ज्यादा लोग उपलब्ध होते हैं, सवाल का महत्व उतना ही बढ़ जाता है। आंदोलन, रैली, धरना आदि इसके अलग अलग प्रकार होते हैं। सामान्य जीवन में आपको उठते हुए कई सवाल दिख जायेंगे। कुछ लोग सवालों के सहारे उठकर काफी ऊपर पहुंच जाते हैं। उठने के बाद कुछ सत्ता की कुर्सी पर बैठ जाते हैं और कुछ अभिमान के सिंघासन पर।

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कुछ सवाल लोगों से भी ऊपर उठ जाते हैं, उनके सामने कितना भी महत्वपूर्ण और बड़ा सवाल हो, बौना ही लगता है। ऐसे में आप कितनी भी ताकत से सवाल उठाएं, वह उठ नहीं पाएगा।
समय-समय पर सवाल अपने आप को दोहराते रहते हैं। ज़रूरत के हिसाब से उठने वाले सवाल भी बदलते रहते हैं। हां, यह सही है कि उठाने वाले वहीं रहते हैं। आजकल मीडिया में कई ऐसे सवाल उठ जाते हैं, जो कब के आउटडेटेड हो गए थे। इसका विषय से कोई सीधा जुड़ाव नहीं होता है, पर एजेंडा की पॉलिश मारकर उन्हें तरोताजा कर दिया जाता है। नेहरू से लेकर सावरकर और नाथूराम गोडसे वाले सवाल अक्सर आपको मीडिया चैनलों पर उठते हुए दिखाई दे जाएंगे। सभी प्रवक्ता अपने अपने सवाल उठाने की कोशिश करते रहते हैं। कोई किसी की मदद नहीं करता, उल्टा सही सवाल को दबाने की कोशिश रहती है। वह बात अलग है कि सवाल दबा नहीं करते। एक सवाल वीडियो एंकर भी उठाता है, कार्यक्रम खत्म होते-होते दर्शक उठ जाते हैं पर सवाल उठ नहीं पाता।
|चलो, सवाल उठाते है|

कुछ सवाल उठाने के लिए नहीं, बल्कि गिराने के लिए उठाए जाते हैं। गिर कर उनकी रीढ़ की हड्डी टूट जाती है और दोबारा उनका कोई जिक्र नहीं होता। ऐसे में कई बार सवालों को उठाने का असली मकसद सवालों को मारना होता है।

जनता बेचारी सवाल ना पूछ पाती है, ना उठा पाती है। उसका आधा टाइम लोगों का सवाल और आधा अपना हाल उठाने में चला जाता है। जिस दिन मीडिया और नेता बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों से उठकर जनता का सवाल उठाने आ जाएंगे, उस दिन देश खड़ा हो जाएगा| 

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