क्या समझे हो???- Hindi Poem

क्या समझे हो???- Hindi Poem

 क्या समझे हो???

_अमित सिंह  चन्देल
 क्या समझे हो???- Hindi Poem
किसी गरीब के जीने को खता समझे हो,
मुझे समझे न अब तक तो क्या समझे हो ?
झूठी बातों से बरगलाते रहे जीवन भर,
मीठी बातें बोलूं तो बुरा समझे हो।
सुखी हर आदमी हो मेरी दिली ख्वाहिश है,
छुपी हुई कहीं तुम इसमें दगा समझे हो।
तुम्हें सिखाता हूँ कि चलो आगे बढ़ो,
तुम हो कि मेरी बातों को धता समझे हो।
तुम महलों में रहो तो कोई बात नहीं,
मैं बना लूं झोपड़ी तो नशा समझे हो।
तुम मोहब्बत करो तो अफसाने बने,
मैं करूँ गर मोहब्बत तो बेवफा समझे हो।
हम लुटाते रहे अपने श्रम-जल को उम्र भर,
तुम सदा से इसे मेरी नियति समझो हो।
तुम्हारे दुआ की खबर मालिक जहान को है,
मेरे दिल की दुआ को बेअसर समझे हो।
तुम्हे है हर जन्नत नसीब तो हो खुशनसीब,
मैं ख्वाब भी देखूं तो बड़े अरमाँ समझे हो।

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तुम करते आए फरेब जमाने भर से,
हमारी छोटी-सी खता भी सजा समझे हो।
तुम जलाओ चिराग तो रोशनी होती है,
हम बुझा चूल्हा भी जलाएँ तो धुंआ समझे हो।
तुम्हारे लिए है सारा चमन, आसमां भी है कम,
मेरे लिए दो गज जमीं भी इम्तिहाँ समझे हो।
सोचा था एक दिन बना लूँगा अपनों का शहर,
मेरी हसरतों को भी अपना हक समझे हो।
इतनी ठोकरें मिली हैं कि जीना मुहाल है,
मेरी इसी बेबसी को अपनी कलम समझे हो।
यही तो लोग हैं तुम्हारे बैरी सदा से,
ऐसे लोगों को आप अपना खुदा समझे हो।
कहूँगा एक दिन मालिक से जाकर,
मैं भी एक इंसान तुम क्या समझे हो?

Thank You for reading क्या समझे हो???- Hindi Poem

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2 comments:

Unknown said...

Good work !! Keep it up 👍

Unknown said...

Nic 👌🏻👌🏻

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Thank you for reading. Stay tuned for more writeups.