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कविता: "जो दृश्य है देखे मैंने"

_अमित  सिंह  चन्देल 
कविता: "जो दृश्य है देखे मैंने"
मजदूर भी  मजबूर भी 
Credits IG:  
 @essaylikhnewala
@adityamishravoice

जो दृश्य है देखे मैंने
कुछ लिखने की हिम्मत नहीं।
केरल से कश्मीर तक  
गुजरात से बिहार तक  
नंगे पैर चलते मजदूर
दिन-रात चले जा रहे हैं
जीवन की इतनी जद्दोजहद  
कुदरत का ऐसा कहर  
सोचा न था किसी ने  
भूखे-प्यासे मासूमों को 
अपने सीने से चिपकाए माँ
चलती जा रही है बस.
चलती ही जा रही है 
उसे बस इतना मालूम है कि  
गाँव बस कुछ ही मील दूर है 
नहीं सुनाई देती किसी को  
उनके पैरों की आहट 
 वे  बस चुपचाप निकल पड़े है 
उस मंजिल की ओर जहाँ 
उनके अपने इंतजार कर रहे हैं।
जो दृश्य है देखे मैंने"
Credits IG:
 
उनकी जिन्दगी हमेशा से थी गुमनाम
लेकिन अब चैनल में उनक 
गढ़ी जा रही हैं कहानियाँ नित
लाचारी-करुणा को बेचकर
उन्हें नहीं कोई अपराध बोध
कि कर सकें उनका कुछ हित।
रोटी की तलाश उन्हें
दर-बदर ठोकरें दे रही थी  
उन्हें क्या पता था
दुख का दरिया कभी पार  न होगा
निकले थे हिम्मत से वे 
अपनों से मिलने की आस
न भूख लगने देती न प्यास
आराम छोड़ नींद में भी  
वे बस चलते जा रहे हैं 
जो दृश्य हैं देखे मैंने
कुछ लिखने की हिम्मत नहीं।

इस महामारी ने जो दिए हैं कष्ट अपार 
अपनों से रूसवा हुआ  
अपनों का प्यार।
लाखों को कर दिया बेघर 
नहीं रहा अब वह रोजगार  
माँ अब भी कर रही बेटों का इंतजार 
वह जो गया था कहीं दूर कामगार  
अभी सफर पूरा नहीं हुआ 
कुछ ही दूर है ढाँढस बाँधा हुआ 
वह सूनी निगाहों से पेट बाँध 
बेगानेपन से बस चलता ही जा रहा  
उनमें से कुछ निकले थे अकेले 
कुछ साइकिल कुछ रिक्शा पर सवार  
कुछ की दरियादिली ने कराया पार 
उन्हें शिकायत नहीं किसी से
वे जानते भी हैं, ये है प्रकृति की मार
पहले भी झेले हैं कई सैलाबों के वार 
उन्हें मालूम है यह आफत  
सिर्फ उन्हीं पर नहीं आई  
इस सफर में उनके जैसे और भी हैं कई यार
उन्हें यकीं है, जब है अपनों का साथ
हो जाएगी यह मंजिल भी इक दिन पार।
जहाँ  छाया  वही आराम 
Credits IG:
 
थककर-टूटकर जब वे सो जाते हैं
सड़क किनारे या पटरी पर बेखबर  
पीछे आ रही मौत का उन्हें क्या पता
 धडधडाती  ट्रेन या बस उन्हें
इतनी गहरी नींद सुला देगी।
जो दृश्य हैं देखे मैंने
 कुछ लिखने की हिम्मत नहीं।

उन्हें लगता नहीं कि अभी कुछ खोया है
 बस, गाँव पहुँचने की ही देरी है।
 क्या हुआ अगर सब कुछ बिक गया
रोजगार गया दूसरा कुछ कर लेगें
भूख-प्यास-धूप भी सह लेगें।
ठेकेदार ने पैसा नहीं दिया, कोई बात नहीं
तपती धूप में घायल पैर हैं,
कोई बात नहीं कितने दिन से 
नहाया नहीं, 
कोई बात नहीं
घर में लोग कितना परेशान है, कोई बात नहीं
पर बीमार बच्चों की सुध फटती छाती
वह करे भी क्या, मजबूर है मजदूर
बस, घर पहुँचने की देरी है 
अपनी मौन व्यथा भी वह किससे कह 
क्या कोई सुनने वाला भी है।
पढ़ सके तो कोई पढ़े न
उसकी चुभती निगाहों का दर्द
क्या जान सके कभी उसकी फटेहाली का मर्म
चलते-चलते बहुत कुछ खोकर भी
अभी वह थका है, हारा नहीं है।

 @essaylikhnewala
 
उसे सदा से है अपने श्रम पर यकी
उसने बनाए हैं बड़े-बड़े ताजमहल

आप  पढ़ रहे  है कविता: "जो दृश्य है देखे मैंने"

उसके श्रम से गुलजार है शहर 
उसी की नियामत से सजती है थाली
स्वयं को गलाकर करता रहा सृजन
सदियों से सहता रहा पीड़ा अपार
आज कहीं मानवता हो न जाए शर्मसार
चलो मिलकर कर लें आज उसका भी सत्कार।
जो दृश्य देखे हैं मैंने
 कुछ लिखने की हिम्मत नहीं।

 


 

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