भारत की बेरोजगारी/ Hindi satire

भारत की बेरोजगारी/  Hindi satire

बेरोजगारी एक गंभीर समस्या  है, पर क्या बेरोजगारी सिर्फ व्यक्तियों  तक  ही  सीमित  है ? खासकर  इस दौर  में  जहाँ  संपूर्ण  विश्व  की अर्थव्यवस्था धरासाई हो  गई है। ऐसे समय  में भारत की बेरोजगारी  का सजीव  वरणन करने का प्रयास  किया है  ।
भारत की बेरोजगारी/ Essay on Unemployment in Hindi

भारत की बेरोजगारी-एक व्यंग्य कथा

 -अनिरुद्ध
यह शीर्षक शायद "भारत में बेरोजगारी" होना चाहिए था, है ना? अगर इस शीर्षक को ध्यान से देखा जाए तो इसमें दो शब्द इतने महान है कि पूरे ब्रह्मांड में इनकी चर्चा होती है। बात अचंभित करने वाली तो है लेकिन सच्चाई से परिपूर्ण है । जी हां मैं भारत और बेरोजगारी की बात कर रहा हूँ । देश के बारे में सोचकर ही मन के चक्षु भारत के उस दिव्य-रूप का दर्शन करवाते हैं, जिसे हम गौरवान्वित होकर सोने की चिड़िया कहते थे। चलिए माना कि अंग्रेजों ने इस चिड़िया का बटर-चिकन और कबाब बना कर मजे तो बहुत लिए ,पर कहीं ना कहीं इसने उनके हाजमें के संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया। अब बेचारे अंग्रेज भी कहां जानते थे कि बेरोजगारी तो जेठालाल की वह कुंडली है जिसमें परेशानियों के अनेक राहु-केतु समाए हैं। माफ करिएगा ...यह तो काफी आधुनिक बात हो गई यह कहना सही होगा कि आदि काल से हमारा देश बेरोजगार है ।
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अब आप ही बताइए, जबसे आप के श्री चरण इस पावन भूमि पर पड़े हैं तब से लेकर आज तक आपने इस शब्द के चरित्र का कितनी बार अलग-अलग पहलु पर मूल्यांकन किया होगा ? लेकिन सोचने वाली बात है कि भारत में भले ही बेरोजगारी है लेकिन हमारे भारतीय भाई-बहन इस चीज की परिभाषा को कोई और ही ढंग से देखते हैं । अब अभी का हाल देखिये ...पहले लाॅकडाउन नहीं था तब लोग आउट-ऑफ़-होम (out of home) काम करते थे , अब लाॅकडाउन है तो लोग वर्क- फ्रॉम -होम (work from home) कर रहे हैं । परंतु .....परंतु यहां के बड़े-बड़े उद्योगपति ये चिंता में डूबे हैं कि कहीं वे बेरोजगार न हो जाएं । 

भारत की बेरोजगारी/ Essay on Unemployment in Hindi
अरे मुझे तो वह उन बुद्धिजीवियों के साक्षात दंडवत करने का मन करता है , जो अपने स्वास्थ्य की परवाह ना करते हुए देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए लंबी कतार में जा लगे हैं ताकि उन्हें इस कोरोना नामी पहलवान से दो-दो हाथ करने तो मिले । यह भी कितनी अच्छी मिसाल बना रहे हैं देशभक्ति की है ना ? एक तरफ देश के इतने दिनों से बंद होने से लोगों के पास पैसा नहीं है, ठीक से खाने पीने के लिए नहीं है, लेकिन उस अनमोल वस्तु के लिए वे दिन-रात एक कर देंगे ।
अरे भाई इनसे अच्छी अर्थव्यवस्था संभालने वाले और कौन हो सकते हैं ? इसलिए इस व्यंग्य का शीर्षक "भारत की बेरोजगारी" नहीं "भारत में बेरोजगारी" ही सही है क्योंकि, यहां के लोगों के मन में बेरोजगारी है , और आप तो इस बात से भलिभांति अवगत होंगे कि लोगों की मानसिकता किसी दृढ़-निश्चय के परामर्श को भी एक हँसी का पात्र बना कर रख देती है । बेरोजगारी वह अँधेरा है जिसे लोगों का मनोबल-रूपी दीपक खत्म कर सकता है, ना कि वे अतृप्त आकांक्षाएं जो कि मजबूरी के पाँव तले दबी रहती है ।
अंत में यही कहना उचित होगा -
"जन्म का कोई मोल नहीं है
जन्म-मनुस का तोल नहीं है
कर्म से है सबकी पहचान
सबको सम्मति दे भगवान।"

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