8 things that Ramayana Teaches us- In Hindi

8 things that Ramayana Teaches us- In Hindi

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8 things that Ramayana Teaches us- In Hindi
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रामायण आदि कवि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया संस्कृत का एक अनुपम महाकाव्य है। इसके 24,000 श्लोक हिन्दू स्मृति का वह अंग हैं जिसके माध्यम से  भगवान विष्णु के रामावतार को दर्शाया गया है। यह रघुवंश के राजा राम की अमिट गाथा  है जिसमे  एक आदर्श पिता, आदर्श पुत्र, आदर्श पत्नी, आदर्श भाई, आदर्श मित्र, आदर्श सेवक और आदर्श राजा को दिखाया गया है।
लेखक: राजन पाठक

रामानंद सागर की रामायण

इस लॉकडाउन के चलते जनता की मांग पर सरकार ने पूरे 33 साल बाद रामानन्द सागर द्वारा निर्देशित की  गई रामायण  के पुनः प्रसारण के लिए दूरदर्शन को अनुमति दे।
इससे पहले रामायण का प्रसारण पहली बार दूरदर्शन पर साल 1987 में किया गया था। 25 जनवरी 1987 को इसके पहले एपिसोड का प्रसारण किया गया था और 31 जुलाई 1988 को आख़िरी एपिसोड दर्शकों को प्रस्तुत किया गया था। इस धारावाहिक के कुल 78 एपिसोड थे,औऱ हफ्ते में यह एक बार हर रविवार को दिखाया जाता था।
रामायण के पुनः प्रसारण से लोगों में एक अथक उत्साह देखने को मिला। लोगो ने अपने सारे काम को एक तरफ रख कर रामायण में दिखाई गई भगवान श्री राम की मर्यादित  लीलाओं का भरपूर आनंद उठाया।
रामायण में दिखाए गए किरदारों में, लोगो को भगवान श्री राम का किरदार बहुत पसंद आया। यह किरदार अरुण गोविल जी द्वारा निभाया गया , जिन्हें लोग भगवान राम की संज्ञा भी देते हैं। साथ ही महाबली हनुमान जी का किरदार बेहद  पसंद किया गया । यह किरदार दारा सिंह जी द्वारा निभाया गया जो कि अब हमारे बीच नहीं रहे।
रामायण के पुनः प्रसारण से सभी किरदार जनता के मानस पटल पर पुनः रेखांकित हो गए है रामायण ने दर्शकों के मामले में कई लोकप्रिय टीवी शो  को भी पछाड़ दिया।16 अप्रैल को दुनियाभर में रिकॉर्ड व्यूअरशिप के साथ रामायण  7.7 करोड़ दर्शकों के साथ दुनिया का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला मनोरंजन शो बन गया।
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कलयुग में रामायण का महत्व

1. पितृ प्रेम

रामायण में मनुष्य के जीवन में एक मर्यादा और उत्तम चरित्र को दर्शाया गया  है, जिससे हमे अनेक सीख मिलती  है।जैसे रामायण में श्री राम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए  राज वैभव का त्याग कर वन का मार्ग चुना । रामायण में यह भी कहा गया है कि
न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्‌।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिपा॥
अर्थात  पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।।
आज के बच्चे पिता के बूढ़े होते ही उन्हें वृद्धाश्रम में भेज देते  है। और तो और कई जगह पर तो उनसे उनके जमीन जायदात को छीन कर उन्हें घर से निकाल दिया जाता है उसके बाद वो कहाँ जाएंगे,आज के लोभी बेटों को इस बात  से कोई लेना देना नहीं रहता। यह सब घटनाएं समाज के लिए बहुत ही निंदनीय है। आज के समाज को रामायण से सीख लेनी चाहिए कि पिता को अपना परम धर्म और प्रथम देवता मान कर अपना पुत्र धर्म निभाए।

2. भ्रातृ प्रेम

वहीं दूसरी ओर भरत ने उनकी चरण पादुकाएँ लेकर सेवक- भाव से तभी तक राज्य का भार धारण किया, जब तक वे वन से लौट नहीं आये ।
और लक्ष्मण जैसे भाई जो कि राजसी ठाट से अपना जीवन सुखद तरीके से बिता सकते थे परन्तु उन्होंने श्री राम के प्रति अनन्य भ्रातृ प्रेम की वजह से उनके साथ वन जाना अपना धर्म माना । आज  के युग में टुकड़े भर जमीन के लिए भाई एक दूसरे के जान के दुश्मन बने बैठे है। अतः रामायण के प्रचार और प्रसार की अत्यंत आवश्यकता है, जिससे लोग सम्पत्ति की निरर्थकता समझ सकें ।आज भारतीय जीवन में यदि आदर्श की कुछ मर्यादा बची है, तो इसका श्रेय   रामायण को ही जाता है ।
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3. वैवाहिक जीवन

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भगवान श्री राम ने अपने विवाह के उपरांत सीता जी को उपहार स्वरूप में यह वचन दिया था  की मेरे जीवन में तुम्हारे  अलावा जीवन संगानी के रूप में किसी दूसरी स्त्री के लिए कोई स्थान नहीं होगा और तुम सदैव एक मित्र के भाती मेरे हृदय में रहोगी।
आज का मानव समाज यदि अपने जीवन में यह  संदेश धारण कर ले तो वैवाहिक  जीवन को टूटने से बचाया जा सकता है, तथा नारी के प्रति घरेलू हिंसाओं को  काफी हद तक कम किया जा सकता है और दाम्पत्य  जीवन को सुरक्षित किया जा सकता है। जिससे एकसुदृण समाज का निर्माण होगा।

4. उदारता का व्यवहार:-

भगवान राम के विनम्र आचरण से ही हमे अपने से बड़ों और छोटों सबको सम्मान देने की  सीख मिलती है। उनका स्वभाव बहुत ही धीर औऱ गंभीर था।हमें ऊंच -नीच , अमीरी -गरीबी आदि  जैसे भेदभावों को भुला कर  सबसे समान व्यवहार करना चाहिए। हमें पशुओं से भी प्यार और दयालुता से पेश आना चाहिए। सच्चा मानव वही है जो सबके प्रति समान आचरण करता है।
आज समाज में लोग एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या और शत्रुता का व्यवहार रखते हैं। आज के  समाज में व्यकितयों  में शीलता जैसे गुणों का अभाव होने के कारण लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में खुद  का ही पतन करते जा रहे हैं। ऐसे में लोग अगर एक दूसरे के प्रति अच्छा व्यवहार करें, बदला लेने की जगह माफ करने की भावना रखें तो हमारा समाज अपराध मुक्त हो सकता है। भगवान श्री राम की तरह अगर यह समाज धीरज रखना सीख ले तो हम  इस लॉकडाउन में कोरोना जैसे कितने ही वैश्विक  महामारी और न जाने  कितनी ही बुराइयों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

5. अच्छी संगति का उदाहरण
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रामायण हमें अच्छी संगति के महत्व को भी सिखाता है।
अस अभिलाषु नगर सब काहू।कैकयसुता हृदयँ अति दाहू।।
को न कुसंगति पाई नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।
कैकयी राम को अपने पुत्र भरत से भी ज़्यादा चाहती थी ,लेकिन दासी मंथरा की बुरी सोच और गलत बातों में आकर वह राम के लिए 14 वर्षों का वनवास मांग लेती है।इस से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अच्छी संगति में रहना चाहिए ताकि नकारात्मकता हम पर हावी ना हो।
आज के समय में अधिकांश युवा वर्ग गलत संगति में डूबते चले जा रहे है । कुछ अच्छा करने की तो दूर उन्हें अपने जीवन, अपने  परिवार, समाज तक की कोई परवाह नहीं है। रामायण के प्रसारण से युवा में भी काफी  उत्साह देखने को मिला है। बस देखना यह वो अपने जीवन में इसको कितना महत्व देते है।

6. "बुराई पर अच्छाई की जीत"

बुराई कितनी भी शक्तिशाली  क्यों ना हो लेकिन अपनी अच्छी नीयत और गुणों के कारण सत्यता की ही जीत होती है। इसलिए हमें अपने जीवन में एक अच्छा लक्ष्य बना कर  सैदव उसके के प्रति अग्रसर रहना चाहिए।
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7. परम मित्रता का संदेश


रामायण हमारे समाज में एक सुंदर छाप छोड़ता है।
यह समाज में ऊंच -नीच , राजा -रंक के बीच के भेद को मिटाता है। रघुकुल वंशज भगवान श्री राम एक राजा के पुत्र होकर भी उनकी मित्रता निषाद जैसे परम भक्तसे थी। जिससे समाज में बराबरी का संदेश जाता है।भगवान राम और सुग्रीव की मित्रता के संदर्भ में यह चौपाई
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥
मनुष्य को यह ज्ञान देती है कि मित्रता निभाने वाले की भगवान भी सहायता करते हैं। जो लोग मित्र या फिर दूसरों के दुख को देखकर दुखी नहीं होते, उन लोगों की मदद स्वयं भगवान भी नहीं करते हैं।  जो लोग अपने दुख को भूलकर दूसरों की सहायता करते हैं, उन पर सदैव ईश्वर कि असीम अनुकम्पा होती है । आज के समय में युवा वर्ग में मित्रता का  भाव बहुत देखने को मिलता है, परन्तु उसमे कई त्रुटियां रहती हैं ।आज अगर एक मित्र ग़लत रास्ते पर चला जाता है तो दूसरा उसे रोकने के बजाए उसे प्रोत्साहित करता है। आज समाज को अगर मित्रता की मिसाल लेना है तो, और अगर  कुछ सीख लेनी  है तो रामायण में सुग्रीव जैसे मित्र के कई मिसाल दिए गए हैं।

8. जीवन की नैतिकता

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मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥
सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। इस व्याधि से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। जैसे, काम, वात, लोभ, अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है, जो सदा छाती जलाता रहता है। ऐसे लोग जीवन में कुछ नहीं कर पाते। हमेशा आगे बढ़ने के लिए इन चीजों को त्यागना जरूर पड़ता है।
रामायण के अयोध्याकांड में इंकित लक्ष्मण गीता के नाम से भी प्रसिद्ध एक चौपाई है-
काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।।
हमें यह भी सीख मिलती है कि हमें अपने कर्मों को प्रधान मानकर सारे कार्य को बिना फल की इच्छा के करना चाहिए,क्योंकि बाद में हमें अपने ही किए कर्मों को भोगना पड़ता है चाहे वह सुख हो या दुख हो।
रामायण से इन अच्छाइयों को हमें अपने समाज में स्थापित कर एक सभ्य और आदर्श समाज की स्थापना करनी चाहिए।
"मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सुदशरथ अजिर बिहारी"
जो मंगल करने वाले है और अमंगल को दूर करने वाले है , वो दशरथ नंदन श्री राम है वो हम सब पर अपनी कृपा करें।
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